अटलजी ने कहा था 'मैं अंदर से भी हिंदू हूं और बाहर से भी

किस्सा 16 मार्च 2002 का है। उस दिन माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर लोकसभा में अयोध्या की स्थिति पर वाजपेयी जवाब दे रहे थे। उनके बोलने के पहले कांग्रेस, वामपंथ सहित अन्य दलों और विचारधाराओं के सांसद अटलजी पर दबाव बनाने के लिए खूब प्रश्न उछाल चुके थे। कुछ ने तो यहां तक कह दिया, 'अटलजी प्रधानमंत्री बने रहने के लिए बाहर तो अपनी छवि धर्मनिरपेक्ष रखते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर वे हिंदू संगठनों को समर्थन देते हैं अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि स्थल का मामला भले ही सुलझ गया है, लेकिन इस मसले ने देश में संसद से लेकर सड़क तक खूब बहस करवाई। संसद में जब भी बहस हुई, देश ने सांस थामकर सुना। एक बार ऐसी ही बहस में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने अपने वाक् चातुर्य और हाजिरजवाबी से विरोधियों को चुप कर दिया। दरअसल, विपक्षी सांसदों की कोशिश थी कि वे 'अटलजी से राम जन्मभूमि पर कुछ ऐसा कहलवा दें जिससे देश में बवाल मचे, किंतु अटलजी ने सधे ढंग से बात कही कि वे कह भी गए और विरोधियों को समझ भी न आया कि क्या प्रतिक्रिया दें। विपक्षी सांसदों के आरोपों के बीच अटलजी खड़े हुए। बोलना शुरू करने का उनका अंदाज ही ऐसा था कि सब शांत होकर सुनने लगे। वे बोले- 'जो मुझ पर सिर्फ बाहर से धर्मनिरपेक्ष होने का आरोप लगा रहे हैं, वे जरा मुझे ये समझा दें कि विचार प्रक्रिया में ये अंदर और बाहर क्या होता है? इस पर सदन में सन्नाट छा गया। अटलजी फिर बोले- 'मैं अंदर से भी हिंदू हूं और बाहर से भी। हिंदुत्व मेरे प्राण हैं और यह मेरी संस्कृति, मेरे संस्कार हैं। कोई दूसरा यह कैसे तय कर सकता है कि मैं अंदर से क्या हूं और बाहर से क्या!" उनके तल्ख लहजे से सदन में सन्न्ाटा और गहरा हो गया। जब सब चुप हो गए तो अटलजी अपने विन्रम अंदाज में बोले- 'धर्मनिरपेक्षता क्या होती है, यह सवाल उठाने वालों को हिंदू धर्म से सीखना चाहिए। इस संसार में सनातन धर्म से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष कोई और नहीं। यही है जो सबको अपने में समा लेता है। और आप हमें धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ा रहे हैं।