टाइगर अभी जिंदा है। कोरोना की मार झेलता चंदेरी हथकरघा वस्त्र कुटीर उद्योग



          यदि कोई इंसान इस बात को लेकर खुश है कि भारत सरकार अथवा राज्य सरकार द्वारा आठ जून से लॉकडाउन खोल दिए जाने के कारण अब कोई परेशानी नहीं है। सारी की सारी परिस्थितियां पूर्व जैसी सामान्य हो गई है तो हमारा मानना है कि वह एक बहुत बड़ी गलतफहमी का शिकार है। क्योंकि कोरोना वायरस बीमारी ने भारत को अभी अलविदा न कहकर और तेजी से अपने पैर पसारना प्रारंभ कर दिए हैं। देश-प्रदेश सरकार द्वारा प्रतिदिन कोरोना मरीजों से संबंधित जारी आंकड़े इन तथ्यों के गवाह हैं कि वायरस से संक्रमित रोगियों की तादाद में तेजी से दिन प्रति दिन इजाफा हो रहा है। कोरोना वायरस महामारी की मार से मात्र मानव समाज ही त्रस्त नहीं है बल्कि उसने मानव समाज की रोजी-रोटी कमाने के जो जरिए, संसाधन थे उन पर भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से डाका डाल कर बुरी तरह प्रभावित किया है। यानी हम यह कह सकते हैं कि कोरोना के कारण आज दुनियां कि प्रत्येक इंसान दोहरी मार झेल रहा है। एक ओर जहां पीड़ित इंसान अपनी जिंदगी से हाथ धो रहा है तो वहीं दूसरी ओर दो जून की रोटी जुटाने के संसाधन ठप्प हो जाने अथवा ठप्प होने की कगार पर पहुंच जाने के कारण बदहाली की ओर अग्रसर होते देखा जा रहा है। यदि हम भारतीय परिवेश में महा नगरों, नगरो, कस्बों और गांवों में स्थापित परम्परागत लघु मध्यम कुटीर उद्योग की बात करें जिसमें हथकरघा कुटीर उद्योग भी शामिल है। वर्तमान हालात बद से बदतर होते नजर आ रहे हैं। याद रखना होगा कि देश प्रदेश में कृर्षि व्यवसाय के बाद हथकरघा कुटीर उद्योग बहुत बड़ी जनसंख्या को रोजगार ही उपलब्ध नहीं कराता बल्कि उनके जीवन में खुशहाली के रंग भरने का माध्यम भी बनता है। हाथकरघा के माध्यम से अपने तथा अपने परिवार के पेट की आग को शांत करने वाले जिन्हें आमतौर पर बुनकर कहा जाता है आज कोरोना के दुष्परिणाम के चलते बेबस लाचार भरी जिंदगी जीने को मजबूर होकर रोग प्रतिरोधक क्षमता बरकरार रखते हुए अपने घर की दरों-दीवार पर बैठे-बैठे पानी पी-पी कर उस मनहूस घड़ी को कोस रहे हैं जिसमें कोरोना वायरस का जन्म हुआ था।


        एक हजार साल से निरंतर आबाद ऐतिहासिक एवं पर्यटन नगर चंदेरी की आन-बान-शान ही नहीं अपितु नगर की रीढ़ यानी जीवन रेखा चंदेरी साड़ियां एवं अन्य वस्त्र निर्माण हाथकरघा की बदौलत अपना नाम राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन कर रही हैं। जिसमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनुभव प्राप्त स्थानीय हुनरमंद बुनकरों का खून पसीना शामिल है। यह बुनकरों के हाथों का कमाल है कि एक नहीं अनेक बुनकर राज्य अथवा राष्ट्रीय स्तर पर साड़ियों के माध्यम से उत्कृष्ट बुनाई कार्य हेतु सम्मानित एवं पुरस्कृत हो चुके हैं। निरंतर 14वीं-15वीं सदी से नगर में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए हुए यह हाथकरघा कुटीर उद्योग आज कोरोना की मार से बेहाल हुआ जा रहा है। उसका कारण है कि यह एक ऐसा लघु कुटीर उद्योग है जिस में उपयोग होने वाला कच्चा मटेरियल बाहर से आता है अथवा बुलाया जाता है। दूसरे हाथकरघा के माध्यम से बुनकर चंदेरी साड़ियां अथवा अन्य वस्त्र निर्मित करते हैं फिर उन्हें स्थानीय मास्टर बुनकर अथवा साड़ी व्यापारी के यहां जमा कर अपनी तयशुदा मजदूरी प्राप्त कर लेते हैं। मास्टर बुनकर- साड़ी व्यापारी फिर तैयार माल को भारत के विभिन्न भागों में अपनी व्यापारिक योग्यता, व्यापारिक रिश्ते, आर्थिक क्षमता अनुसार विक्रय करते रहते है। वहीं दूसरी ओर भारत सरकार वस्त्र मंत्रालय, प्रदेश सरकार अपने-अपने स्तर पर देश विदेश में हुनर- हाट, मेला-प्रदर्शनी आदि आयोजित कर बुनकरों को सीधे बाजार उपलब्ध कराता है ताकि बुनकर अपनी कार्यक्षमता का संपूर्ण लाभ प्राप्त कर सकें और यह भी सत्य है कि शासन की योजनाओं का भरपूर लाभ सीधा बुनकर प्राप्त भी करता है। स्थानीय हथकरघा वस्त्र कुटीर उद्योग में पिछले कुछ वर्षों से सब कुछ अच्छा भला चल रहा था। बुनकरों एवं मास्टर बुनकर-साड़ी व्यापारियों के आपसी तालमेल के अतिरिक्त देश प्रदेश की सरकारों के सहयोग एवं मार्गदर्शन में बुनकरों की जिंदगी की रेलगाड़ी पटरी पर अपनी नियमित चाल से अच्छी खासी चल रही थी कि माह मार्च में अचानक कोरोना वायरस महामारी रूपी आपातकालीन ब्रेक लग जाने के कारण चलती गाड़ी रुकी ही नहीं बल्कि पटरी से बेपटरी होती नजर आ रही है। कारण है कि आवागमन के सभी साधन बंद होने के कारण कच्चे माल आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है साथ ही सबसे बड़ी परेशानी तैयार संपूर्ण उत्पादित माल मास्टर बुनकर अथवा साड़ी व्यापारी के घर पर रखा होने के कारण, विक्रय न हो पाने के कारण सारा का सारा व्यापार अस्त व्यस्त होता नजर आ रहा है।


       कहने और सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि लॉकडाउन खुल गया है लेकिन स्थानीय स्तर पर हाथकरघा कुटीर उद्योग से जुड़े बुनकर एवं उन पर आश्रित परिवार के अलावा स्थानीय मास्टर बुनकर, साड़ी व्यापारियों की स्थिति कुछ और ही परिस्थितियां बयान कर रही हैं। सबसे बड़ी समस्या जो उभरकर सामने आ रही है वह है कि बुनकरों द्वारा तैयार चंदेरी साड़ियां एवं अन्य वस्त्रों का विक्रय भारतीय बाजार में नहीं  हो पा रहा है जिसके कारण मास्टर बुनकर, साड़ी व्यापारी नवीन वस्त्र उत्पादन नहीं कराने की स्थिति में आ गए हैं। अभी तक जो मास्टर बुनकर या साड़ी व्यापारी बुनकरों से बुनाई कार्य करा रहे थे। वह भी भारतीय बाजार की वर्तमान हालत, सामने बरसात का मौसम, घर में पूर्व से तैयार रखा उत्पादित माल,  नतीजन वह धीरे-धीरे अपने हाथ पीछे खींच चुके हैं अथवा धीरे-धीरे खींच रहे हैं। वह भी क्या करें उनकी भी अपनी एक आर्थिक सीमा है। वह स्वंय अपनी पूंजी फंसा कर बाजार चलने की राह सुबह-शाम आशा भरी नजरों से देख रहे है इन सब हालातों का सीधा-सीधा असर बुनकर परिवारों की जिंदगी के ताना-बाना पर पड़ रहा है। आज एक अजब स्थिति बन पड़ी है बुनकर काम करना चाहता है लेकिन उसको काम नहीं मिल रहा है यदि मिल भी रहा है तो कम मिल रहा है। कोरोना की मार से ऐसे बुनकरों की हालत और ज्यादा खराब हुई है जो अभी-अभी अपने पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर की परिभाषा को समझ रहे थे यानी वह स्वयं कच्चा मटेरियल क्रय कर तद्उपरांत साड़ी निर्माण कर स्थानीय स्तर पर अथवा आसपास के क्षेत्र में विक्रय कर दिया करते थे। आज तैयार उत्पादन को घर में रखे हुए बैठे हैं कोई खरीददार नहीं है।

 

      जिस नगर के हर दूसरे घर में बुनकरों की आत्मा बसती है। जहां प्रत्येक दूसरे घर में से हथकरघा से निकलती खट-खट की आवाज हर किसी राहगीर का ध्यान अपनी ओर बरबस खींच लेती थी। आज उन घरों में हथकरघा बंद हो जाने के कारण  सन्नाटा पसरा हुआ है।

          ऐसी परिस्थितियों में भारत सरकार वस्त्र मंत्रालय एवं राज्य सरकार द्वारा हुनर हाट, प्रदर्शनी जैसे आयोजन आयोजित करना अथवा अन्य ऐसे उपाय करना जिसके माध्यम से सीधे तौर पर बुनकर लाभान्वित हो सकें।  इसके अलावा भारत सरकार वस्त्र मंत्रालय  एवं मध्य प्रदेश शासन  अपने उपक्रम मध्यप्रदेश हस्तशिल्प विकास निगम एवं मध्य प्रदेश  लघु उद्योग निगम द्वारा बुनकर एवं मास्टर बुनकर से हाथकरघा द्वारा निर्मित उत्पादन को क्रय कर मृगनयनी आदि एम्पोरियम के माध्यम से *न लाभ- न हानि* तर्ज पर बुनकरों की सहायतार्थ प्रचार-प्रसार के साथ विक्रय करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने की नितांत आवश्यकता जान पड़ती है। इतिहास गवाह है कि इस लघु कुटीर उद्योग ने अपनी सात सौ साल से निरंतर चल रही जीवन यात्रा के दौरान एक बार नहीं कई बार आसमानी सुल्तानी मुसीबतों का सामना करते हुए नाना-नाना प्रकार की परेशानियों को सहा है लेकिन पराजित कभी नहीं हुआ है।

उम्मीद की जाती है कि शासन सहयोग से इस बार भी ऐसा ही होगा *कोरोना हारेगा और चंदेरी साड़ियां जीत का परचम लहराएंगी।* जानकारी मिलती है कि 1944 ईस्वी में भी इस कुटीर उद्योग क्षेत्र में ऐसे ही नहीं बल्कि इससे भी बदतर हालत निर्मित हुए थे। तब ग्वालियर रियासत सिंधिया सरकार ने आर्थिक सहायता मुहैया कराकर इस लघु कुटीर उद्योग को डूबने से बचा लिया था। आज राजशाही नहीं लोकतंत्र है अतएव क्षेत्रीय सियासतदानों खासतौर से चंदेरी विरासत पर्यटन क्षेत्र में पूर्व से संवेदनशील गहरी रुचि रखने वाले नवनिर्वाचित राज्यसभा सदस्य श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया का ध्यान अपेक्षित है क्योकिं टाइगर अभी जिंदा है।


 

(देश जीतेगा-कोरोना हारेगा)

एक दिन तो गुजारिए चन्देरी में

भवदीय-  मजीद खां पठान (सदस्य) जिला पर्यटन संवर्धन परिषद चन्देरी जिला अशोकनगर (म. प्र.)