राजावत् होकर नयन, पहन लाज का ताज।
भावों पर शासन करें, और हृदय पर राज।।
राजावत् होता हृदय, खुद पर खुद का राज।
स्वात्मा हेतु विहारता, पहन योग का ताज।।
गूढ़ पुरुष अनुभूति के, बता गये यह राज।
मम कलिका मकरंद से, तृप्त अन्य अलि आज।।
हीरा तज पत्थर चुना, कोकिल स्वर तज काग।
सुधा कलश तज विष चुना, हाय तुम्हारा भाग।।
हृदय गुहा में नित्य है, उसका ही आवास।
लगता कितनी दूर है, उसका होना पास।।
नित्य बसा उर खोह में, देखे साधे मौन।
नातिदूर हो दूर है ,वह चरित्र है कौन?
थकते कदमों में लगे, आशाओं के बाण।
रोटी कर में रह गयी, भूख ले गयी प्राण।
सुरा तमस में स्वास्थ्य का, डूब रहा आदित्य।
व्यर्थ तुम्हारी साधना, व्यर्थ तुम्हारे कृत्य।।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'
रामपुर कलाँ, सबलगढ़, मुरैना(म.प्र.)
मो. -9516113124