बहुत हैं हम अकेला वह,
बताओ किधर जलाऐं।
किसी का घर जलाऐं।
गुनाहों से हमें क्या है,
कोई आरोप मढ़ दें।
विवश है सामने वाला,
कि मिल हम सब रगड़ दें।
नियम कानून ढीले हैं,
चलो हम शहर जलाऐं।
किसी का घर जलाऐं।
अरे हम भीड़ हैं अपनी,
विवेकी बुध्दि है गिरवी।
मनोरंजन भी हो जाए,
कि बरतेंगे जो बेरहमी।
कोई रोता विलखता हो,
हमें क्या बशर जलाऐं।
किसी का घर जलाऐं।
जुबां अनुनय- विनय करती,
लहू बहता हमें भाता।
हमारी बेवशी हम पशु,
वनों के हिंसा से नाता।
करेंगे नीचता हरदम,
सदा दर दर जलाऐं।
किसी का घर जलाऐं।
अंकित शर्मा 'इषुप्रिय'
रामपुर कलाँ, सबलगढ़,मुरैना (म.प्र.)
मो. -9516113124