ऐतिहासिक नगरी चंदेरी की बत्तीसी बावड़ी अपना दर्द खुद वया करती है ,सुगम पहुंच मार्ग का अभाव
       
ए गर्दिश-ए-अय्याम हमसे ना उलझ

  हमने हर हाल में जीने की कसम खा रखी है

 

  बत्तीसी बावड़ी का अपना दर्द 

             यदि मैं नगर से तीन किलोमीटर, बायपास से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित हूं तो इसमें मेरी क्या गलती है। मैं तो आज तक अपने स्थापित स्थल से हिली- डुली भी नहीं हूं और हां यह भी सच है कि हिल-डुल भी नही सकती इसलिए आज भी वैसी ही हूं जैसी 1487-88 ईस्वी में थी। हां आसपास की परिस्थितियां समय-समय पर बदलती रही है जिसमें मेरा कोई कसूर नही है।     देखें पूर्व काल में मेरे आसपास स्थित बंगला नामक इमारत, मस्जिद, आबादी थी आज नहीं है। पूर्वकाल में विशाल खूबसूरत बगीचा मेरे चारो ओर हरा-भरा था, आज रिक्त भूमि, झांड़-झंकड़ सामने है।


     याद आ रहा है वह समय जब मालवा सुल्तान ग्यास शाह के शासनकाल 1485 ईस्वी में मुझे स्थापित करने हेतु निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ था और याद आ रहा है वह समय जब मैंने 1487- 88 ईस्वी में पूर्णता: को प्राप्त कर नगर की सुंदरता में चार चांद लगाते हुए सिरमौर का दर्जा हासिल किया था और खुशी इस बात की है कि आज भी नगर में सैकड़ों की संख्या में कुंआ-बावड़ियों की उपस्थिती उपरांत मेरा तगमा बरकरार है।

          मैं साठ फीट चौक-चौकोर चार भाग में विभक्त होकर प्रत्येक भाग में आठ घाट, इस प्रकार बत्तीस घाट होने के कारण मुझे बत्तीसी बावड़ी के नाम से पहचाना जाता है। उस समय मेरी बनावट, सुन्दरता साथ ही मेरे आस-पास विकसित सुंदर बगीचा के चर्चे दूर-दूर तक मशहूर थे। बगीचा का निर्माण भी ऐसा-वैसा नही बल्कि उस समय चीन में स्थापित बगीचे की तर्ज पर किया गया था जिसे नगर में *गुलजार-ए- चीन* संबोधित किया जाता था।

           मैंने ऊपर जो भी कहा उसके एक नहीं दो-दो जिंदा सबूत आज भी अपने दामन में हिफाजत से रखे हुए हूं। जो भी मुझसे साक्षात्कार करता है। मेरे बारे में जानकारी चाहता है उसे मैं बावड़ी संलग्न पूर्वी दिशा से चौड़ी-चकली प्रवेश सीढ़ियां के दाएं बाएं की दीवार की तरफ इशारा कर देती हूं। जहां पत्थर पर उत्कीर्ण शिलालेख आज भी जड़ित होकर सब कुछ सच-सच बयान कर रहे है।

           आज नगर में एक नहीं अनेक नामचीन बावड़ियां अपना अस्तित्व खो चुकी हैं अथवा खोने के कगार पर पहुंच कर जींदगी और मौत के बीच झूल रही है। विपरीत इसके मैं आप सब की असीम कृपा से सदियों से आसमानी - सुल्तानी मार से बचते -बचाते अपने स्वरूप को यथावत रखने में सफल होकर *वैसी की वैसी* मूल स्थिति में *भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (भारत सरकार)* के संरक्षण में विधिवत राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित होकर सुरक्षित हूं। भला हो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इकाई चंदेरी का जिन्होंने मेरी सुरक्षा की चिंता करते हुए चारों ओर पक्की सुरक्षा दीवार का निर्माण कराया साथ ही प्रवेश द्वार के निकट पत्थर पर मेरा परिचय उत्कीर्ण एवं स्थापित कर आमजन को सरलता से समझाया।

           लेकिन आज मेरा दु:ख यह है कि सुगम सुविधायुक्त पहुंच मार्ग की उपलब्धता न होने के कारण मेरे से मेल मिलाप करने वाले मेरे मेहमान सैलानी चाह कर भी मेरे पास तक नहीं आ पाते। मैं यह भी खुलासा कर दूं कि मैं कोई नवीन मार्ग नही चाहती बल्कि पूर्वकाल से आमजन के उपयोग में आ रहे रास्ता जो वर्तमान में जर्जर ऊबड़-खाबड़, बरसात में दलदलयुक्त होती स्थिति से निजात चाहती हूं ताकि मेरे दीदार करने वाले आमजन बारह माह मेरे पास आकर अपनी आंखों की प्यास बुझा सकें। मेरा मन आहत होता है जब नगर में आते सैलानी सभी स्मारकों से खुशी-खुशी मिलते जुलते हैं  और *एक मैं हूं* जो सुगम पहुंच मार्ग के अभाव में पर्यटक मेरे और मैं उनके दीदार, चहलकदमी के साथ उनके बयान सुनने को तरसती हूं। आश्चर्य होता है देश 1947 ईस्वी में आजाद हुआ 1956 ईस्वी में भारत सरकार द्वारा मुझे राष्ट्रीय महत्व का स्मारक दर्जा प्राप्त हुआ लेकिन सुगम पहुंच मार्ग की किसी ने भी सुध नही ली। आज परिस्थितियां तेजी से बदली है चन्देरी पर्यटन प्रचार-प्रसार के कारण आए दिन मुझे देखने वाले आते-जाते है जिन्हें रास्ता में परेशानी का सामना करना पड़ता है।


            ऐसा भी नहीं है कि मैंने अपनी *मन की बात* किसी को ना बताई हो। कोई तो मौखिक कहता है, मैंने तो लिखित में अपनी पीड़ा यानि समस्या बयान की है। एक नहीं कई बार राजस्व विभाग, वन विभाग, नगर पालिका, लोक निर्माण विभाग की चौखट पर एक दरवाजे से दूसरे दरवाजे पर अपनी फरियाद लिए भटकती रही हूं।

                ऐसा भी नहीं है कि मेरे दर्द को किसी ने समझा ना हो, याद आ रहा है 2014-15 ईस्वी का वह समय जब तात्कालीन SDM आदरणीय *सुरभि गुप्ता (आई.ए.एस.)* ने मेरे दर्द को सुना समझा और विधिवत कार्यवाही को आगे बढ़ाया। परिणाम स्वरूप राजस्व, वन, लोक निर्माण,  नगर पालिका इत्यादि विभागों के अधिकारी कर्मचारियों ने पहुंच मार्ग का मौका मुआयना, नाप-तौल किया, और मेरे दर्द को चन्देरी पर्यटन के साथ सार्वजनिक हित में सही पाया।


      आगे आने वाले समय में मेरे दर्द भरे दांस्तायुक्त आवेदन पत्र राजस्व विभाग, वन विभाग और नगर पालिका के मध्य शासकीय पत्राचार के मध्य झूलते रहें। यही नही पर्यटन, संस्कृति विभाग को प्रेषित पत्रों पर म.प्र. शासन संस्कृति विभाग मंत्रालय, म.प्र. शासन लोक निर्माण विभाग मंत्रालय द्वारा वकायदा आगामी कार्यवाही को अंजाम दिया लेकिन धरातल पर कुछ न होकर आज भी मेरी समस्या राजस्व एवं वन विभाग की अनुमति के मध्य झमेले से मुक्त न हो सकी। याद रहें उक्त पुराना परम्परागत रास्ता भूमि राजस्व एवं वन विभाग अतंर्गत है।

          बावजूद इसके सब कुछ जानते हुए और मानते हुए मैं थकी हारी नहीं हूं। आशा से आसमान टिका हुआ है कहावत में पूर्ण विश्वास रखते हुए समय-समय पर अधिकारियों, जन प्रतिनिधियों के समक्ष आवेदन पत्र प्रस्तुत कर अपनी दास्तां बयान इस आशा के साथ आकृर्षित करती रहती हूं कभी न कभी कोई न कोई शख्स मेरे दर्द को संजीदगी के साथ समझेगा और मेरा समुचित स्थाई इलाज करेगा। पिछले सप्ताह ही एस.डी.एम. साहब को आवेदन पत्र के माध्यम से अपना दु:खड़ा सुनाया है। समझ नही आ रहा है कि किस की कृपा कहां अटकी हुई है। उक्त समस्या निदान हेतु किए गए समस्त पत्राचार का विरासत-पर्यटन प्रेमी मजीद माध्यम ही नही अपितु मेरा पक्का गवाह भी है।

         अगर आप मेरी मदद कर सकते है तो जरूर करें क्योकिं मैं मात्र चन्देरी की नही सारे देश की राष्ट्रीय धरोहर हूं। आपका भी मेरे ऊपर हक उतना ही है, जितना अन्य किसी का, मैं आपका एहसान कभी नही भूलूगी बल्कि मजीद से कहूंगी कि आपके योगदान की बात सब को बताएं ताकि अन्य के लिए सबक बन सकें कि अच्छा पवित्र काम करने का प्रतिफल कितना सुखद होता है। मुझे पुन: पक्की उम्मीद है कि एक न एक दिन कोई न कोई मुझे मेरी उचित सार्वजनिक समस्या से हमेशा-हमेशा के लिए निजात दिलाएगा।  

 

लेखक-  मजीद खां पठान (सदस्य) जिला पर्यटन संवर्धन परिषद चंदेरी जिला अशोकनगर मध्य प्रदेश