गो कोरोना, कोरोना गो... एक छोटा सा जीव, जिसे हम खुली आंखों से देख भी नहीं सकते, वो पूरी दुनिया के सिर  पर भूत बनकर चढ़ गया है

ये कोरोना का भूत है। दुनिया भर के 126 के लगभग देश इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। दुनिया भर में सवा लाख से ज्यादा लोग इस वायरस से संक्रमित हुए। जिनमें से चार हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। पूरे इटली ने खुद को लॉक डाउन कर लिया है। अमेरिका ने विदेशों से आने-जाने वालों पर तमाम तरह की पाबंदियां आयद की हैं। जर्मनी की चांसलर कह चुकी हैं कि ऐसा भी हो सकता है कि जर्मनी के सत्तर फीसदी लोगों को इसके कहर से गुजरना पड़े। विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही इसे महामारी घोषित कर चुका है। भारत ने भी राजनयिक मामलों को छोड़कर अन्य वीजा निरस्त कर दिया है। दिल्ली और हरियाणा में इसे महामारी घोषित किया गया है। दिल्ली में स्कूल बंद हैं। सिनेमा हाल बंद कर दिए गए हैं।
इसी बीच कल यानी गुरुवार के दिन भारत में भी इससे होने वाली पहली मौत कंफर्म हो गई है। कर्नाटक के 76 साल के एक व्यक्ति की मौत तो दो-तीन दिन पहले हो गई थी। लेकिन, अब पुष्टि हो गई है कि इसके पीछे कोरोना वायरस का हाथ है। इससे पहले चीन, ईरान, साउथ कोरिया, इटली, फ्रांस, अमेरिका व अन्य कई देशों में कोरोना वायरस ने कई जानें ली हैं।
कोरोना वायरस क्या है। क्या है इस बीमारी का मतलब। जब आदमी अपने इंसान होने की लड़ाई लड़ रहा था। उस समय उसके पास कुछ नहीं था। बैक्टीरिया और वायरस शुरू से ही इंसान को बीमार करते रहे हैं। जब दवाइयों का पता नहीं चला था, उस समय भी इंसान इसका शिकार होता था। बहुत सारे लोग बीमारी का शिकार होकर मर जाते थे। लेकिन, कुछ लोग अपनी प्रतिरोधक क्षमता से इस बीमारी को हरा देते थे। फिर धीरे-धीरे उपचारों की खोज की गई। आज तमाम तरह के उपचार और मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध है। हर आदमी अपनी जेब की हैसियस से उपचार करा सकता है।
लेकिन, कोरोना वायरस एक ऐसी बीमारी है, जिसका फिलहाल उपचार नहीं है। इसके सामने हर मनुष्य एक समान है। वो पैसे का भेदभाव नहीं करता। उसकेलिए हर आदमी एक शरीर है। जिसमें वो जाकर अपना घर बना सकता है। जब वो घर खराब हो जाए, टूट जाए या मर जाए तो वो किसी दूसरे घर में जा सकता है।
मेरे खयाल से पूरी दुनिया में यह जो उथल-पुथल मची हुई है। वह इसी समानता की वजह से है। जिस दिन कोरोना वायरस का टीका खोज लिया जाएगा। उस दिन यह शोर-शराबा समाप्त हो जाएगा। पैसे वालों को लाखों रुपये में वह टीका उपलब्ध होगा। वो इलाज कराकर खुद को सुरक्षित कर लेंगे। बाकी हजारों-लाखों लोग रोज मरते रहेंगे। उससे किसी को क्या फर्क पड़ता है।
दुनिया जहां पहुंची हुई है, वहां पर गरीबी, असमानता और पूंजीवाद से बड़ी कोई बीमारी नहीं है। यह बीमारी हर दिन लाखों लोगों की जान ले रही है। अगर अगले पचास सालों में इस बीमारी का इलाज नहीं खोजा गया तो यह पूरी धरती को निगल जाने वाली है।
निश्चित तौर पर कोरोना एक वास्तविक खतरा है। भारत को इससे निपटने की तैयारियों के लिए पर्याप्त समय मिला था। लेकिन, वो समय हमने कोरोना पर चुटकुले बनाने में गंवा दिया। हमें अपनी जाहिलियत पर इतना भरोसा था कि हम यह सोचकर बैठे रहे कि इतनी गंदी परिस्थितियों में रहने वाले हमारे लोगों का कोरोना क्या बिगाड़ लेगा। फिर हमें धर्म के नाम पर कत्लोगारत भी तो करना था।
सच है, कोरोना से निपटने के लिए डब्लूएचओ का कहना है कि पानी और साबुून से बार-बार हाथ धोइये। सोचिए, यह कितना नकली है। हमारे देश में पचास करोड़ से ज्यादा लोगों को साफ पानी पीने के लिए उपलब्ध नहीं है। खाने के लिए रोटी ही नहीं है। तो वो हाथ धोने के लिए पानी और साबुन कहां से लाएंगे।
कोरोना वायरस से होने वाले लॉक डाउन के दौरान रोज अपनी रोटी कमाकर गुजारा करने वाले करोड़ों लोगों का क्या होगा। अगर वे अपने घर में खुद को बंद भी कर लेते हैं तो उन्हें रोटी कौन देगा। उन लोगों का क्या होगा जिनके पास रहने को घर ही नहीं है। वे खुद को कहां बंद कर लेंगे।
उन्हें चुनाव करना होगा कि भूख से मरना है या कोरोना से।
इसका जवाब क्या होगा, यह शायद सबको पता है। उन्हें अपनी रोटी कमाने के लिए घरों से निकलना ही पड़ेगा।