इस बार गुरु नानक की 550वीं जयंती मनाई जाएगी.कार्तिक के दिन पूर्णिमा को नानक देव जी की जयंती मनाई जाती है ! गुरु नानक देव जी सिखों के प्रथम गुरु थे.गुरु नानक को चाहने वाले नानक, नानक देव जी, बाबा नानक और नानकशाह नामों से संबोधित करते हैं.गुरु नानक का पर्व बड़ी धूम धाम के साथ मनाया जाता है ! उनका जन्म स्थान राय भोई की तलवंडी जो कि अब पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में स्थित ननकाना साहिब में है गुरु नानक देव जी ने ही श्री करतारपुर साहिब गुरुद्वारे की नींव रखी थी.
गुरु नानक देव जी का जन्म कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा के दिन हुआ था. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के दिन नानक देव जी की जयंती मनाई जाती है.
गुरु नानक देव के पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता देवी था. नानक देव जी की बहन का नाम नानकी था.
गुरु नानक बचपन से सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे. तत्पश्चात् सारा समय वे आध्यात्मिक चिंतन और सत्संग में व्यतीत करने लगे.
गुरु नानक के बचपन के समय में कई चमत्कारिक घटनाएं घटी जिन्हें देखकर गांव के लोग इन्हें दिव्य व्यक्तित्व वाले मानने लगे.
गुरु नानक जी का विवाह सन 1487 में माता सुलखनी से हुआ. उनके दो पुत्र थे जिनका नाम श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द था.
गुरु नानक ने बचपन से ही रूढ़िवादिता के विरुद्ध संघर्ष की शुरुआत कर दी थी. वे धर्म प्रचारकों को उनकी खामियां बतलाने के लिए अनेक तीर्थस्थानों पर पहुंचे और लोगों से धर्मांधता से दूर रहने का आग्रह किया.
नानकदेव जी को लेकर एक कहानी काफी प्रचलित है. एक बार गुरु नानक को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए 20 रुपये दिए और कहा- इन 20 रुपये से सच्चा सौदा करके आओ. नानक देव जी सौदा करने निकले. रास्ते में उन्हें साधु-संतों की मंडली मिली. नानकदेव जी साधु-संतों को 20 रुपये का भोजन करवा कर वापस लौट आए. पिताजी ने पूछा- क्या सौदा करके आए? उन्होंने कहा- 'साधुओं को भोजन करवाया. यही तो सच्चा सौदा है.
. गुरु नानक जी का कहना था कि ईश्वर मनुष्य के हृदय में बसता है, अगर हृदय में निर्दयता, नफरत, निंदा, क्रोध आदि विकार हैं तो ऐसे मैले हृदय में परमात्मा बैठने के लिए तैयार नहीं हो सकते हैं.
गुरु नानक कहते थे कि ईश्वर एक है उसकी उपासना हिंदू मुसलमान दोनों के लिए हैं. मूर्तिपूजा, बहुदेवोपासना को नानक जी अनावश्यक कहते थे. हिंदु और मुसलमान दोनों पर इनके मत का प्रभाव पड़ता था.
गुरु नानक जीवन के अंतिम चरण में करतारपुर बस गए. उन्होंने 25 सितंबर, 1539 को अपना शरीर त्याग दिया. मृत्यु से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया जो बाद में गुरु अंगद देव के नाम से जाने गए.
गुरु पर्व के दो दिन पहले यानी 48 घंटे पहले से ही गुरुद्वारों में सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ प्रांरभ हो जाता है। यह दो दिनों तक बिना रुके लगातार होता है।
गुरु पर्व के दिन गुरु नानक देव जी की जयंती का उत्सव ब्रह्म मुहूर्त में 3 बजे अमृत बेला से सुबह 6 बजे तक होता है यह समय ध्यान और प्रार्थना का मन जाता है !
कार्तिक शुक्ल चतुदर्शी को नगरकीर्तन का आयोजन किया जाता है। इसमें गुरु ग्रंथ साहिब को पालकी में रखा जाता है और भक्तो द्वारा भजन-कीर्तन करते हुए नगर भ्रमण किया जाता हैं।
गुरु पर्व के दिन कथा और कीर्तनकिया जाता है। इसके बाद भंडारे का आयोजन भी होता है। यह देश-दुनिया के सभी गुरुद्वारों में आयोजित किया जाता है।
गुरु नानक देव जी ने समाज में व्याप्त जात-पात, गरीब-अमीर और ऊंच-नीच के भेदभाव को खत्म करने के लिए लंगर की शुरुआत की थी। इसमें सभी वर्ग और समुदाय के लोग जमीन पर पंगत में बैठकर भोजन का आनंद लेते हैं। इसमें तन-मन से से लोग सेवा करते हैं।
गुरु नानक देव जी की याद में और उनकी दी गई शिक्षाओं को अपने जीवन में आत्मसात करने के लिए हर वर्ष गुरु पर्व मनाया जाता है। साथ ही यह भी स्मरण कराया जाता है कि व्यक्ति अपना जीवन ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दें।